अंक 4

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पहला दृश्य


स्थान-वंशनगर राजद्वार

(मण्डलेश्वर वंशनगर, प्रधान लोग, अनन्त, बसन्त, गिरीश, सलारन, सलोने और दूसरे लोग आते हैं)

मण्डलेश्वर : अनन्त आ गए हैं?

अनन्त : धर्मावतार उपस्थित हूँ!

मण्डलेश्वर : मुझे तुम पर अत्यन्त शोच होता है क्योंकि तुम ऐसे दुष्ट कठोर वज्रहृदयवादी (मुद्दई) के उत्तर देने के लिये बुलाए गए हो, जिसे दया नाम को भी नहीं छू गई है।

अनन्त : मैं सुन चुका हूँ कि महाराज ने उसके क्रूर बरताव के नम्र करने के प्रयत्न में कितना श्रम किया परन्तु उस पर किसी बात की सिद्धि नहीं होती और न मैं किसी उचित रीति से उसकी शत्रुता की परिधि के बाहर आ सकता हूँ। अतः मैं अपना सन्तोष उसके अनर्थ के प्रति प्रकट करता हूँ और उसका अत्याचार सहने को सब प्रकार से प्रस्तुत हँँ और कदापि मुख से आह न निकालूँगा।

मण्डलेश्वरः कोई जाये और उस जैन को न्यायालय में उपस्थित करे।

सलोने : महाराज वह पहिले ही से द्वार पर खड़ा है, वह देखिए आ पहुँचा।

(शैलाक्ष आता है)

मण्डलेश्वर : सब लोग स्थान दो जिसमें वह हमारे सम्मुख आकर खड़ा हो। शैलाक्ष, सारा संसार सोचता है और मैं भी ऐसा ही समझता हूँ कि यह हठ तुम उसी क्षण तक स्थिर रक्खोगे जब तक कि उसके पूरे होने का समय न आ जायेगा और तब लोगों का यह विचार है कि तुम जितनी अब प्रकट में कठोरता दिखला रहे हो उसकी अपेक्षा कहीं अधिक खेद और दया प्रकाश करोगे और जहाँ कि अभी तुम उससे प्रतिज्ञा भंग होने का दण्ड लेने पर प्रस्तुत हो (जो इस दीन व्यापारी के शरीर का आध सेर मांस है) वहाँ उस समय तुम केवल इस दण्ड ही के छोड़ने पर अभिमत न हो जाओगे वरंच मनुष्य धर्म और शील का अनुकरण करके मूल ऋण में से आधा छोड़ दोगे। यदि उसकी हानियों की ओर जो इधर थोड़ी देर में उनके ऊपर फट पड़ी हैं ध्यान दिया जाये तो वही इतने बडे व्यापारी की कमर तोड़ देने के लिए बहुत हैं और कोई मनुष्य कैसा ही कठोर चित्त क्यों न हो और पत्थर का हृदय क्यों न रखता हो यहाँ तक कि कोल और भिल्ल भी जिन्होंने कभी शील का नाम नहीं सुना। उसकी दशा को देखकर अत्यन्त ही शोक करेंगे तो ऐ जैन हम लोग आशा करते हैं कि तुम इसका उत्तर नम्रतापूर्वक दोगे।

शैलाक्ष : महाराज को अपने उद्देश्य से सूचित कर चुका हूँ और मैंने अपने पवित्र दिन रविवार की शपथ खाई है कि जो कुछ मेरा दस्तावेज के अनुसार चाहिए वह भग्नप्रतिज्ञ होने के दण्ड के सहित लूँगा। यदि महाराज उसको दिलवाना अनंगीकार करैं तो इसका अपवाद महाराज के न्याय और महाराज के नगर की स्वतंत्रता के सिर पर। महाराज मुझसे यही न पूछते हैं कि मैं इतना मृतमांस छ हजार रुपयों के बदले लेकर क्या करूँगा। इसका उत्तर मैं यही देेता हूँ कि मेरे मन की प्रसन्नता। बस अब महाराज को उत्तर मिला? यदि मेरे घर में किसी घूंस ने बहुत सिर उठा रक्खा हो और मैं उसके नष्ट करने के लिए बीस सहस्र मुद्रा व्यय कर डालूँ तो मुझे कौन रोक सकता है। अब भी महाराज ने उत्तर पाया या नहीं? कितने लोगों को सूअर के मांस से घृणा होती है कितने ऐसे हैं कि बिल्ली को देखकर आप से बाहर हो जाते हैं, तो अब आप मुझ से उत्तर लीजिए कि जैसे इन बातों का कोई मूल कारण नहीं कहा जा सकता कि वह सूअर के मांस से क्यों दूर भागते हैं और यह बिल्ली सदृश दीन और सुखदायक जन्तु से क्यों इतना घबराते हैं वैसे ही मैं भी इसका कोई कारण नहीं कह सकता और न कहूँगा। सिवाय इसके कि मेरे और उनके बीच एक पुरानी शत्रुता चली आती है और मुझे उसके स्वरूप से घृणा है जिसके कारण से मैं एक ऐसे विषय का जिसमें मेरा इतना घाटा है उद्योग करता हूँ। कहिए अब तो उत्तर मिला?

बसन्त : ओ निर्दय यह बात जिससे तू अपने अत्याचार को उचित सिद्ध करता है कोई उत्तर नहीं है।

शैलाक्ष : मेरा कुछ तेरी प्रसन्नता के लिये उत्तर देना कत्र्तव्य थोड़े ही है।

वसंत : क्या सब लोग ऐसे पशु को मार डालते हैं, जिसे वह बुरा समझते हैं।

शैलाक्ष : संसार में कोई भी ऐसा मनुष्य है जो किसी जन्तु के मारने से जिससे वह घृणा करता हो हाथ उठावे।

वसंत : हर एक अपराध से पहिली बार घृणा नहीं उत्पन्न हो जाती।

शैलाक्ष : क्या तुम चाहते हो कि मैं साँप को दूसरी बार डसने का अवसर दूँ।

अनन्त : भगवान के निहोरे नेक विचारो तो कि तुम किससे विवाद कर रहे हो। इसको मार्ग पर लाना तो ठीक वैसी ही बात है जैसा कि समुद्र के किनारे खड़े होकर तरंगों को आज्ञा देना कि तुम इतनी ऊँची मत उठो, या भेड़िये से पूछना कि उसने बकरी के बच्चे को खा कर उसकी माँ को दुःख में क्यों फँसाया, या पहाड़ी खजूर के वृक्षों को कहना कि वह अपनी ऊँची पु$नगियों को वायु के झोंके से न हिलने दें और न पत्तों की खड़खड़ाहट का शब्द होने दें, ऐसे ही तुम संसार के कठिन से कठिन काम कर लो इसके पूर्व कि इस जैन के चित्त को (जिससे कठोरतर दूसरा पदार्थ न होगा) द्रव करने का यत्न करो। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि न तो तुम उससे अब कुछ देने दिलाने की बातचीत करो और न इस विषय में अधिक चिन्ता करो वरंच थोड़े में भाग्य पर सन्तोष करके मुझे दण्ड भुगतने और इस जैन को अपना मनोरथ पूरा करने दो।

वसन्त : तेरे छ हजार रुपयों के बदले यह ले बारह तैयार हैं।

शैलाक्ष : यदि इन बारह हजार रुपयों का हर एक रुपया बारह भागों में बाँट दिया जाए और हर एक भाग एक रुपये के बराबर हो तो भी मैं उनकी ओर आँख उठा कर न देखूँ, मुझे केवल दस्तावेज के प्रण से काम है।

मण्डलेश्वर: भला, तू किसी पर दया नहीं करता तो तुझे दूसरों से क्या आशा होगी?

शैलाक्ष : जब मैंने कोई अपराध ही नहीं किया है तो फिर किस बात से डरूँ? आप लोगों के पास कितने मोल लिए हुए दास और दासियाँ उपस्थित हैं जिन्हें आप गधों, कुत्तों और खच्चरों की भाँति तुच्छ अवस्था में रख कर उनसे सेवा कराते हैं और यह क्यों? केवल इसलिये कि आपने उन्हें मोल लिया है। या मैं आप से यह कहूँ कि आप उन्हें स्वतंत्र करके अपने कुल में ब्याह कर दीजिए, या यह कि उन्हें बोझ के नीचे दबा हुआ पसीने से घुला घुलाकर मारे क्यों डालते हैं, उन्हें भी अपनी सदृश कोमल शैय्या पर सुलाइए और स्वादिष्ट भोजन खिलाइए तो इसके उत्तर में आप यही कहिएगा कि वह दास हमारे हैं हम जो चाहेंगे करेंगे, तुम कौन? इसी भाँति मैं भी आपको उत्तर देता हूँ कि इस आध सेर मांस का जो मैं इससे माँगता हूँ बहुत मूल्य दिया गया है, वह मेरा माल है और मैं उसे अवश्य लूँगा। यदि आप दिलवाना अस्वीकार करें तो आप के न्याय पर थुड़ी है। जाना गया कि वंशनगर के कानून में कुछ भी सार नहीं। मैं राजद्वार की आज्ञा सुनने के लिए उपस्थित हूँ, कहिए मुझे न्याय मिलेगा या नहीं?

मण्डलेश्वर : मुझे निज स्वत्व के अनुसार अधिकार है कि मुकद्दमे के दिन को टाल दूँ। यदि बलवन्त नामी एक सुयोग्य वकील जिसको मैंने इस मुकद्दमे के विचार के लिए बुलाया है आज न आया तो मैं इस मुकद्दमे को टाल दूँगा।

सलारन : महाराज बाहर उस वकील का एक मनुष्य खड़ा है, जो उसके पास से पत्र लेकर अभी पाण्डुपर से चला आता है।

मण्डलेश्वर : शीघ्र पत्र लाओ और दूत को भीतर बुलाओ।

वसंत : अनन्त अपने चित्त को स्वस्थ रक्खो, कैसे मनुष्य हो! साहस न हारो। पहिले इसके कि तुम्हारा एक बाल भी टेढ़ा हो मैं अपना मांस, त्वचा, अस्थि और जान प्राण वो धन उस जैन के अर्पण करूँगा।

अनन्त : गल्ले भर में मन्नत की दुर्बल भेड़ मैं ही हूँ, मेरा ही मरना श्रेय है। कोमल फल सबके पहले पृथ्वी पर गिरता है तो मुझी को गिरने दो। तुम्हारे लिए इससे बढ़कर कोई बात उचित न होगी कि मेरे पश्चात् मेरा जीवनचरित्र लिखो।

(नरश्री वकील के लेखक के भेस में आती है)

मण्डलेश्वर : तुम पाण्डुपुर से बलवन्त के पास से आते हो?

नरश्री : जी महाराज वहीं से उन्हीं के पास से, बलवन्त ने आपको प्रणाम कहा है।

(एक पत्र देती है)

वसंत : क्यों, तू ऐसे उत्साह से छुरी क्यों तीक्ष्ण कर रहा है?

शैलाक्ष : उस दिवालिये के शरीर से दण्ड का मांस काटने के लिये।

गिरीश : अरे निर्दयी जैनी तू अपनी जूती के तल्ले पर छुरी को क्यों तेज करता है, तेरा पाषाण तुल्य हृदय तो प्रस्तुत ही है। पर कोई शस्त्र यहाँ तक कि बधिक की तलवार भी तेरी शत्रुता के वेग को नहीं पहुँच सकती। क्या तुझ पर किसी की विनती काम नहीं आती?

शैलाक्ष : नहीं, एक की भी नहीं जो तू अपने बुद्धि से गढ़ सकता हो।

गिरीश : हा! ओ कठोर कुत्ते, ईश्वर तेरा बुरा करे, यह केवल न्याय का दोष है जिसने अब तक तुझे जीता रख छोड़ा है, तूने तो आज मेेरे धर्म में बट्टा लगा दिया क्योंकि तेरे लक्षणों को देखकर मुझे गोरक्ष के इस विचार को कि पशुओं की आत्मा मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है। मानना पड़ा। तेरी हिंसक आत्मा एक भेड़िये की छाया में थी जो कितने मनुष्यों के जीव वध के लिये सूली चढ़ा दिया गया था। इस अवस्था को पहुँचने पर भी उस नारकी आत्मा को तोष न हुआ और वहाँ से भाग कर जिस समय तू अपनी माता के अपवित्र गर्भ में था तुझमें पैठ गई क्योंकि तेरा मनोरथ भी भेड़ियों की भाँति घातक हिंसक है।

शैलाक्ष : जब तक कि तेरे विचार में इतनी शक्ति न हो कि अनन्त की मुहर का मेरी दस्तावेज पर से मिटा दे सके तब तक इस विचार से क्या फल निकल सकता है। व्यर्थ को तू चिल्ला चिल्ला कर अपना ही कण्ठ फाड़ रहा है। ऐ नवयुवक अपने सुधि की औषधि कर कहीं ऐसा न हो कि तेरे सिर पर कोई आपत्ति आ जाए। क्या मुझे विदित नहीं कि मैं न्याय के लिये यहाँ खड़ा हूँ?

मण्डलेश्वर : बलवन्त अपने पत्र में इस न्याय सभा के लिये नवयुवक विद्वान वकील की सिफारिश करता है, वह कहाँ है?

नरश्री : वह समीप ही आपके उत्तर पाने की प्रत्याशा में खड़े हैं कि आप उन्हें विवाद करने की आज्ञा देंगे या नहीं।

मण्डलेश्वर : अति प्रसन्नता से। आप दो चार महाशय जाएँ और उनका समादर करके सम्मान के साथ यहाँ ले आएँ तब तक विचारसभा बलवन्त का पत्र सुनेगी।

(लेखक पढ़ता है)

श्रीमन्, मैने महाराज का पत्र अस्वस्थ होने की अवस्था में पाया। परन्तु जिस समय आप का दूत पहुँचा उस सम्यक् मेरे मित्रों में से मालवा के एक युवा वकील बालेसर नामी मेरी भेंट करने को आए हुए थे। मैंने उनको जैन और अनन्त सौदागर के मुकद्दमे का सब व्यौरा समझा दिया। हम दोनों मनुष्यों ने मिल कर कई व्यवस्थाएँ पलट कर देखीं। मैंने अपनी सम्मति उनसे प्रकट कर दी है अतः वह मेरी सम्मति लेकर जिसे वह अपनी योग्यता के बल से (जिसकी प्रशंसा मैं किसी मुँह से नहीं कर सकता) और सुधार लेंगे। मेरे निवेदन के अनुसार मेरे स्थानापन्न महाराज की सेवा में उपस्थित होते हैं। प्रार्थना करता हूँ कि महाराज उनकी अल्प अवस्था का ध्यान न करके उनके आदर में कदापि न्यूनता न करेंगे क्योंकि मेरी दृष्टि में ऐसी थोड़ी अवस्था का पुरुष ऐसी पुष्कल बुद्धि के साथ आज तक नहीं आया। मैं उन्हें महाराज की सेवा में अर्पण करता हूँ, परीक्षा से उनकी योग्यता का हाल भली भाँति खुल जायेगा।

मण्डलेश्वर : आप लोगों ने सुना कि प्रसिद्ध विद्वान् बलवन्त ने क्या लिखा है और जान पड़ता है कि वकील महाशय भी वह आ रहे हैं।

(पुरश्री वकीलों की भाँति वस्त्र पहने हुए आती है)

मण्डलेश्वर : आइए हाथ मिलाइए, आप ही वृद्ध बलवन्त के पास से आते हैं?

पुरश्री : महाराज।

मण्डलेश्वर : मुझे आप के आने से बड़ी प्रसन्नता हुई, विराजिए। आप इस मुकद्दमे को जानते हैं जिसका इस समय विचारसभा में विचार हो रहा है?

पुरश्री : मैं उसके वृत्तान्त को भलीभाँति जानने वाला हूँ। वर्णन लीजिए कि इन लोगों में से कौन सौदागर है और कौन जैन?

मण्डलेश्वर : अनन्त और वृद्ध शैलाक्ष दोनों सामने खड़े हो जाओ।

पुरश्री : तुम्हारा नाम शैलाक्ष है?

शैलाक्ष : हाँ मेरा नाम शैलाक्ष है।

पुरश्री : यह तुमने विचित्र मुकद्दमा रच रक्खा है, परन्तु नियमानुसार वंशनगर का कानून तुमको उसके प्रयत्न से रोक नहीं सकता, और आप ही इनके पंजे में फँसे हैं, क्यों साहिब?

(अनन्त से)

अनन्त : जी हाँ, मुझी पर इनका लक्ष्य है।

पुरश्री : आप तमस्सुक लिखना स्वीकार करते हैं।

अनन्त : निस्सन्देह मैं स्वीकार करता हूँ।

पुरश्री : तब तो अवश्य है कि जैन दया करे।

शैलाक्ष : मैं किस बात से दब कर ऐसा करूँ यह तो कहिए?

पुरश्री : दया ऐसी वस्तु नहीं जिसे आग्रह की आवश्यकता हो। वह जलधारा की भाँति नभ मण्डल से पृथ्वीतल पर गिरती है। उसका दुहरा फल मिलता है अर्थात् पहले उसको जो करता है और दूसरे उसको जिसे उसका लाभ पहुँचता है। महानुभावों को यह अधिकतर शोभा देती है, मण्डलेश्वरों को यह मुकुट से अधिकतर शोभित है। राजदण्ड केवल सांसारिक बल प्रकट करता है जो आतंक और तेज का चिन्ह है और जिससे राजेश्वरों का भय लोगों के चित्त पर छा जाता है परन्तु दया का प्रभाव राजदण्ड के प्रभाव की अपेक्षा कहीं अधिक है दया का वासस्थान राजेश्वरों का चित्त है, यह एक प्रधान महिमा ईश्वर की है। अतः संसार के राजेश्वर उसी समय दैवतुल्य प्रतीत होते हैं जबकि वह न्याय के साथ दया का भी बरताव करते हैं। इसलिए ऐ जैनी यद्यपि तू न्याय ही न्याय पुकारता है किन्तु विचार कर कि केवल न्याय ही के भरोसे पर हममें से कोई मरने के उपरान्त मुक्त होने की आशा नहीं कर सकता। हम ईश्वर से दया की प्रशंसा करते हैं तो चाहिए कि वही प्रार्थना हमको भी दया के काम सिखावे। मैंने इतना तेरे न्याय के आग्रह से हटाने के निमित्त से कहा पर यदि तू न मानेगा तो जैसे हो सकेगा वंशनगर की विचारशीला न्यायसभा तुझे इस सौदागर पर विनयपत्र दे देगा।

शैलाक्ष : मेरा किया मेरे सिर पर। मैं राजद्वार से अपने तमस्सुक के अनुसार दण्ड दिला पाने की प्रार्थना करता हूँ।

पुरश्री : क्या वह रुपया चुका देने की क्षमता नहीं रखता।

बसन्त : हाँ, मैं राजद्वार में उनकी सन्दी अभी दूना देने को उपस्थित हूँ। यदि इससे भी उसका पेट न भरे तो मैं उस जमा का दस गुना दूँगा और यदि न दे सकूँ तो दण्ड में अपना सिर अर्पण करूँगा। यदि इस पर भी वह न माने तो स्पष्ट है कि शत्रुता के आगे धर्म की दाल नहीं गलती। मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप अपने निज अधिकार से इस बार कानून का प्रतिबंध छोड़ दीजिए। एक बड़े भारी उपकार की अपेक्षा में थोड़ी सी अनीति स्वीकार कीजिए और हे मण्डलेश्वर, अत्याचारी पिशाच की बुराई को रोकिए।

ख्मण्डलेश्वर से,

पुरश्री : ऐसा न होना चाहिए। वंशनगर के कानून के अनुसार किसी को यह अधिकार नहीं है कि नीति को रोक सके। यह विचार दृष्टान्त की भाँति पर लिखा जायेगा और बहुत सी त्रुटियाँ इसके कारण राजा के कामों में आ पड़ेंगी। यह कदापि नहीं हो सकता।

शैलाक्ष : वाह वाह मानो महात्मा विक्रम आप ही न्याय के लिये उतर कर आए हैं। वास्वत में आपको विक्रम ही कहना चाहिए। ऐ युवा बुद्धिमान न्यायकर्ता मैं नहीं कह सकता कि मैं चित्त से आपका कितना समादर करता हूँ।

पुरश्री : कृपाकर, नेक मुझे तमस्सुक तो देखने दो।

शैलाक्ष : लीजिए सुप्रतिष्ठ वकील महाशय यह उपस्थित है।

पुरश्री : शैलाक्ष तुम्हें तुम्हारे मूलधन का तिगुना मिल रहा है।

शैलाक्ष : शपथ, शपथ, मैं शपथ जो खा चुका हूँ। क्या मैं झूठी शपथ खाने का पाप अपने माथे कर लूँ? न, कदापि नहीं, यदि मुझे इसके बदले में वंशनगर का राज्य भी हाथ आए तौ भी ऐसा न करूँ।

पुरश्री : इस तमस्सुक की गिनती तो टल चुकी और इसके अनुसार विवेकतः जैन को अधिकार है कि सौदागर के हृदय के पास से आध सेर मांस काट ले। परन्तु उस पर दयाकर और तिगुना रुपया लेकर मुझे तमस्सुक फाड़ डालने की आज्ञा दे।

शैलाक्ष : हाँ उस समय जब कि मैं लिखे अनुसर दण्ड दिला पाऊँ। मुझे प्रतीत होता है कि आप एक योग्य न्यायी हैं, आप कानून से परिचित हैं और उसके तात्पर्य को भी ठीक समझते हैं, तो मैं आपको उसी की शपथ देता हूँ जिसके आप पूरे आधार हैं कि आप आज्ञा सुनाने में विलम्ब न करें। मैं अपने प्राण की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि मनुष्य की जिह्ना में इतना सामथ्र्य नहीं कि मेरा मनोरथ फेरे। मुझको सिवाय तमस्सुक के प्रणों के और किसी बात से क्या प्रयोजन।

अनन्त : मैं भी चित्त से चाहता हूँ कि न्यायकत्र्ता आज्ञा सुना दे।

पुरश्री : तो बस आपको छाती खोलकर प्रस्तुत रहना चाहिए।

शैलाक्ष : वाह रे योग्यता! वाह रे न्याय! आहा! क्या कहना है!

पुरश्री : क्योंकि कानून का अभिप्राय यही है कि प्रतिज्ञा भंग करने का दण्ड तमस्सुक के प्रणानुसार सब अवस्था में दिया जाना चाहिए, तो वह इस अवस्था में भी उचित है।

शैलाक्ष : बहुत ठीक, क्या कहना है, न्यायकर्ता को ऐसा ही बुद्धिमान और न्यायी होना चाहिए! यह अवस्था और यह बुद्धि।

पुरश्री : अब आप अपनी छाती खोल दीजिए।

शैलाक्ष : जी हाँ छाती ही, यही तमस्सुक में लिखा है, है न मेरे सुजन न्यायकर्ता, हृदय के समीप ये ही शब्द लिखे हैं।

पुरश्री : ऐसा ही है, परन्तु बताओ कि मांस तोलने के लिये तराजू रक्खे हैं?

शैलाक्ष : मैंने उन्हें ला रक्खा है।

पुरश्री : शैलाक्ष, अपनी ओर से कोई जर्राह भी बुला रक्खो कि उसका घाव बन्द कर दे, जिसमें अधिक रक्त निकलने से कहीं वह मर न जाए।

शैलाक्ष : क्या यह तमस्सुक में लिखा है?

पुरश्री : नहीं लिखा तो नहीं परन्तु इससे क्या, इतनी भलाई यदि उसके साथ करोगे, तो तुम्हारी ही कानि है।

शैलाक्ष : मैं नहीं करने का, तमस्सुक में इसका वर्णन नहीं है।

पुरश्री : अच्छा सौदागर साहिब, तो अब आपको जो कुछ किसी से कहना सुनना हो कह सुन लीजिए।

शैलाक्ष : केवल दो बातें करनी हैं, नहीं तो मैं सब भाँति उपस्थित और प्रस्तुत हूँ। लाओ बसन्त, मुझे अपना हाथ दो, मैं तुमसे विदा होता हूँ। तुम इस बात का कदापि ख्ेाद न करना कि मुझ पर यह आपत्ति तुम्हारे कारण आई क्योंकि इस समय पर भाग्य अपने नियम देखने आया है कि वह भाग्यहीन मनुष्य को उनकी लक्ष्मी चले जाने के उपरान्त ठोकर खाने और दुरवस्था से दारिद्रय का दुःख उठाने के लिए छोड़ देती है किन्तु मुझे वह एक साथ इस जन्म भर के क्लेश से छुटकारा दिए देती है। अपनी सुशील स्त्री से मेरा सलाम कहना और उनसे मेरे मरने का हाल कह देना। जो स्नेह मुझे तुम्हारे साथ था उसका भी वर्णन करना, मेरे प्राण देने के ढंग को सराहना और जिस समय मेरी कहानी कह चुके तो उनसे न्यायदृष्टि से पूछना कि किसी समय में बसन्त का भी कोई चाहने वाला था या नहीं। मेरे प्यारे तुम इस बात का खेद न करो कि तुम्हारा मित्र संसार से उठा जाता है क्योंकि निश्चय मानो कि उसे इस बात का नेक भी शोच नहीं कि वह तुम्हारे ऋण को अपने प्राण देकर चुकाता है क्योंकि यदि जैन ने गहरा घाव लगाने में कमी न की तो मैं तुरन्त उससे उऋण हो जाऊँगा।

बसन्त : अनन्त मेरा ब्याह एक स्त्री के साथ हुआ है जिसे मैं अपने से अधिक प्रिय समझता हूँ, परन्तु मेरा प्राण, मेरी स्त्री और सारा संसार तुम्हारे जीवन के सामने तुच्छ है, और तुमको इस दुष्ट राक्षस के पंजे से छुड़ाने के लिए मैं इन सब को खोने वरंच तुम पर से न्यौछावर करने को प्रस्तुत हूँ।

पुरश्री : यदि तुम्हारी स्त्री इस स्थान पर उपस्थित होती तो तुम्हारे मुँह से अपने विषय में ऐेसे शब्द सुन कर अवश्य अप्रसन्न होती।

गिरीश : मेरी एक स्त्री है, जिसे मैं धर्म से कहता हूँ कि प्यार करता हूँ परन्तु यदि उसके स्वर्ग जाने से किसी देवता की सहायता मिल सकती, जो इस पापी जैन के चित्त को फेर देता तो मुझे उससे हाथ धोने में कुछ शोच न होता।

नरश्री : यही कुशल है कि तुम उसकी पीठ पीछे ऐसा कहते हो, नहीं तो न जाने आज कैसी आपत्ति मचती।

शैलाक्ष : (आप ही आप) इन आर्यपतियों की बातें सुनो! मेरी बेटी का ब्याह तो यदि बरवण्ड के सदृश्य किसी व्यक्ति से हुआ होता तो मैं अधिक पसन्द करता, इसकी अपेक्षा कि वह एक आर्य की स्त्री बने। (चिल्ला कर) समय व्यर्थ जाता है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप विचार सुना दें।

पुरश्री : इस सौदागर के शरीर का आधा सेर मांस तुम्हारा ही है, जिसे कि कानून दिलाता है और राजसभा देती है।

शैलाक्ष : वाह रे न्यायी!

पुरश्री : और यह मांस तुमको उसकी छाती से काटना चाहिए, कानून इसको उचित समझता है और न्यायसभा आज्ञा देती है।

शैलाक्ष : ऐ मेरे सुयोग्य न्यायकर्ता! इसका नाम विचार है। आओ, प्रस्तुत हो।

पुरश्री : थोड़ा ठहर जा, एक बात और शेष है। यह तमस्सुक तुझे रुधिर एक बूँद भी नही दिलाता, 'आध सेर मांस' यही शब्द स्पष्ट लिखे हैं। इसलिए अपनी प्रण प्राप्ति कर ले अर्थात् आध सेर मांस ले ले परन्तु यदि काटने के समय इस आर्य का एक बूँद रक्त भी गिराया तो वंशनगर के कानून के अनुसार तेरी सब संपत्ति और लक्ष्मी व सामग्री राज्य में लगा ली जायेगी।

गिरीश : वाह रे विवेकी! सुन जैन-ऐ मेरे सुयोग्य न्यायी!

शैलाक्ष : क्या यह कानून में लिखा है?

पुरश्री : तुझे आप कानून दिखला दिया जायेगा क्योंकि जितना तू न्याय न्याय पुकारता है उससे अधिक न्याय तेरे साथ बरता जायेगा।

गिरीश : आहा! वाह रे न्याय! देख जैनी कैसे विवेकी न्यायकर्ता हैं।

शैलाक्ष : अच्छा मैं उसकी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ-तमस्सुक का तिगुना देकर वह अपनी राह ले।

बसन्त : ले यह रुपये हैं।

पुरश्री : ठहरो, इस जैनी के साथ पूरा न्याय किया जायेगा, थोड़ा धीरज धरो, शीघ्रता नहीं है, उसे दण्ड के अतिरिक्त और कुछ न दिया जायेगा।

गिरीश : ओ जैनी देख तो कैसे धार्मिक और योग्य न्यायी हैं। वाह वाह!

पुरश्री : तो अब तू मांस काटने की प्रस्तुतियाँ कर, परन्तु सावधान स्मरण रखना कि रक्त नाम को भी न निकलने पावे और न आध सेर मांस से न्यून वा अधिक कटे। यदि तूने ठीक आध सेर से थोड़ा सा भी न्यूनाधिक काटा यहाँ तक कि यदि उसमें एक रत्ती बीसें भाग का भी अन्दर पड़ा, वरंच यदि तराजू की डाँडी बीच से बाल बराबर भी इधर या उधर हटी तो तू जी से मारा जायेगा और तेरा सब धन और धान्य छीन लिया जायेगा।

गिरीश : वाह वाह! मानो महाराज विक्रम आप ही न्याय के लिए उत्तर आए हैं! अरे जैनी देख महाराज विक्रम ही तो हैं! भला अधम तू अब मेरे हाथ चढ़ा है।

पुरश्री : ओ जैनी तू अब किस सोच विचार में पड़ा है? अपना दण्ड ग्रहण कर ले।

शैलाक्ष : अच्छा मुझे मेरा मूल दे दो मैं अपने घर जाऊँ।

बसन्त : ले, यह रुपया उपस्थित है।

पुरश्री : यह भरी सभा में रुपये का लेना अस्वीकार कर चुका है। अब इसे न्याय और दण्ड के अतिरिक्त कुछ न मिलेगा।

गिरीश : विक्रम महाराज! सचमुच यह विक्रम ही तो हैं। ऐ जैनी, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू ने मुझे अच्छा शब्द बतला दिया।

शैलाक्ष : क्या मुझे मेरा मूल धन भी न मिलेगा?

पुरश्री : तुझे दण्ड के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलने का। इससे ऐ जैनी अपने जी पर खेल कर उसे वसूल कर ले।

शैलाक्ष : अच्छा मैंने उसे राक्षस को सौंपा अब मैं यहाँ कदापि न ठहरूँगा।

पुरक्षी : ठहर ओ जैनी, तुझ पर कानून की एक और धारा है। वंशनगर के कानून में यह लिखा है कि यदि किसी परदेसी के विषय में यह सिद्ध हो कि उसने प्रकट या गुप्त रीति पर वंशनगर के किसी रहने वाले के वध करने की चेष्टा की तो वह प्रतिवादी जिसके विषय में ऐसा यत्न किया गया हो अपने प्रतिवादी की आधी सम्पत्ति पर अधिकार दिला पाने का दायी है और शेष आधा राजकोष में ग्रहण किया जायेगा। अपराधी के मुक्त करने का केवल मण्डलेश्वर को अधिकार है, उसमें कोई दूसरा हस्तक्षेप नहीं कर सकता। तो जान, ओ जैनी कि इस समय तेरी अवस्था अत्यन्त दुर्बल है क्योंकि मुकद्दमा के विवरण से यह स्पष्ट है कि तू ने जान बूझ कर प्रतिवादी के प्राण लेने की चेष्टा की और इस भाँति उस आपत्ति में, जिसका मैं ऊपर वर्णन कर चुका हूँ, फँसा है। इसलिए तुझको उचित है कि मण्डलेश्वर के चरणों पर सिर पर रख कर दया की प्रार्थना कर।

गिरीश : सुन जैनी, मैं तुझे एक उपाय बताऊँ; मण्डलेश्वर से निवेदन कर कि तुझे आप फाँसी लगाकर मर जाने की आज्ञा दें। परन्तु तेरी धन सम्पत्ति तो छीन ली जायेगी अब तेरे पास इतना बचेगा कहाँ कि रस्सी मोल ले सके, इसलिए तुझको राजा ही के व्यय से फाँसी देनी पड़ेगी।

मण्डलेश्वर: जिसमें तुझे हमारे और अपने स्वभाव में अन्दर जान पड़े मैंने बेमाँगे तेरा जी बचा दिया। अब रही तेरी सम्पत्ति सो उसमें से आधी तो अनन्त की हो चुकी और आधी राज्य की, जिसके पलटे में यदि तू दीनता प्रकाश करेगा तो दण्ड ले लिया जायेगा।

पुरश्री : अर्थात् जितना राज्यांश है उसके बदले में, अनन्त के भाग से कुछ प्रयोजन नहीं।

शैलाक्ष : नहीं मेरा प्राण और सब कुछ ले लीजिए, वह भी न क्षमा कीजिए। जब कि आप उस आधार को जिस पर मेरा घर खड़ा है लिए लेते हैं तो मेरे घर को पहले ले चुके, इस भाँति जबकि आपने मेरे जीवन का आधार छीन लिया तो मानो मेरा प्राण पहले ले चुके।

पुरश्री : अनन्त तुम उसके साथ कितनी दया कर सकते हो।

गिरीश : भगवान के वास्ते सिवाय एक रस्सी के जिससे वह फाँसी लगाकर मर सके और कुछ व्यर्थ न देना।

अनन्त : मैं मण्डलेश्वर और राजसभा से विनती करता हूँ कि उसके अर्धभाग के बदले का दण्ड मैं इस शर्त पर देने को प्रस्तुत हँू कि वह भाग शैलाक्ष मेरे पास धरोहर की भाँति जमा रहने दे, जिसमें उसके मरने पर जो मनुष्य हाल में उसकी लड़की को ले भागा है उसको सौंप दूँ। परन्तु इसके साथ दो प्रण हैं अर्थात् पहले तो वह इस बर्ताव के लिए आर्य हो जाए और दूसरे इस समय सभा में एक दानपत्र इस आशय का लिख दे कि उसके मरने पर उसकी सारी सम्पत्ति उसके जामाता लवंग और उसकी लड़की को मिले।

मण्डलेश्वर: उसे यह करना पड़ेगा, नहीं तो मैंने जो क्षमा की आज्ञा अभी दी है उसे काट देता हूँ।

पुरश्री : क्यों जैनी तू इस पर प्रसन्न है, कह क्या कहता है?

शैलाक्ष : मैं प्रसन्न हूँ।

पुरश्री : लेखक अभी एक दानपत्र लिखो।

शैलाक्ष : भगवान् के निहोरे मुझे यहाँ से जाने की आज्ञा दीजिए, मेरी बुरी दशा है। पाण्डुलिपि मेरे मकान पर भेज दीजिए मैं हस्ताक्षर कर दूँगा।

मण्डलेश्वर : अच्छा जा, परन्तु हस्ताक्षर कर देना।

गिरीश : आर्य होने से तेरे दो धर्म बाप होंगे। कदाचित मैं न्यायकर्ता होता तो दस और होते जिसमें तुझे आर्य करने के लिए मंदिर भेजने के बदले में सूली पर पहुँचा देते।

(शैलाक्ष जाता है)

मण्डलेश्वर : महाशय मैं प्रार्थना करता हूँ कि आज आप मेरे साथ भोजन करें।

पुरश्री : महाराज मुझे क्षमा करें, मुझे आज ही रात को पाण्डुपुर जाना है और यह अत्यन्त आवश्यक है कि मैं अभी चला जाऊँ।

मण्डलेश्वर: मैं खेद करता हूँ कि आपको अवकाश नहीं है। अनन्त इनका भली भाँति सत्कार करो क्योंकि मेरी जान तुम पर इनका बड़ा उपकार है।

(मण्डलेश्वर, बड़े बड़े प्रधान और उनके चाकर जाते हैं)

बसन्त : ऐ मेरे सुयोग्य उपकारी, आज मैं और मेरे मित्र आपके बुद्धि वैभव से आपत्ति से मुक्त हुए, जिसके बदले छ सहस्र मुद्रा को जैन के पाने थे मैं बड़ी प्रसन्नता से आप की भेंट करता हूँ क्योंकि आपने हमारे निमित्त कष्ट सहन किया है।

अनन्त : और इनके अतिरिक्त हम लोग जन्म भर तन मन से आपके दास बने रहेंगे।

पुरश्री : जिस मनुष्य का चित्त अपने किए पर तुष्ट हुआ उसने अपनी सारी मजदूरी भरपाई और मेरे चित्त को इस बात की बड़ी प्रसन्नता है कि आप मेरे द्वारा मुक्त हुए, इससे मैं समझता हूँ कि आपने मुझको सब कुछ दिया। मेरे चित्त में आज तक मिहनताना पाने का ध्यान नहीं हुआ है, क्योंकि मुझे किराये के टट्टई बनने से घृणा है। कृपापूर्वक जब मेरा आपका कभी फिर साक्षात् हो तो मुझे स्मरण रखियेगा। ईश्वर आपकी रक्षा करें, अब मैं विदा होता हूँ।

बसन्त : महाशय मेरा धर्म है कि इस बारे में आपसे फिर प्रार्थना करूँ, कृपा करके कोई वस्तु हम लोगों के स्मरणार्थ मिहनताने करके नहीं वरंच एक स्मारक चिन्ह की भाँति स्वीकार कीजिए। मेरी प्रार्थना है कि आप मेरी दो बातें स्वीकार करें, एक तो यह है कि आप मेरी प्रार्थना को स्वीकार करें और दूसरे मेरी धृष्टता को क्षमा करें।

पुरश्री : आप मुझे अत्यन्त दबाते हैं इसलिये अब अधिक अस्वीकार करना निश्शीलता है। अच्छा एक तो मुझे आप अपने दस्ताने दें, मैं उन्हें आपकी प्रसन्नता के लिये पहनूँगा और दूसरे आपके स्नेह के चिद्द में इस अँगूठी को लूंगा। हाथ न खींचिए, मैं और कुछ न लूँगा पर मुझे निश्चय है कि आप मेरे स्नेह के निहोरे इसके देने में अनúीगार न करेंगे।

बसन्त : यह अंगूठी महाशय! खेद, यह तो एक अत्यन्त तुच्छ वस्तु है मुझे आप को देते लज्जा आती है।

पुरश्री : मैं इसको छोड़ और कुछ कदापि न लूँगा और मुख्य करके मेरा जी इसके लेने को बहुत ही चाहता है।

बसन्त : मैं इसके मोल लेने के ध्यान से वह बातचीत नहीं करता, इसमें कुछ और ही भेद है। वंशनगर के राज्य में जो अँगूठी सब से अधिक मूल्य की होगी उसे मैं सूचना देकर मँगवाऊँगा और आप के अर्पण करूँगा पर केवल इस अँगूठी के लिये आप मुझे क्षमा करें।

पुरश्री : बस महाशय बस, मैंने समझ लिया कि आप बातों के बड़े धनी हैं। पहले तो आपने मुझे भीख माँगना सिखलाया और अब यह ढंग बताते हैं कि भिखमंगे को किस भांति टालना चाहिए।

बसन्त : मेरे सुहृद, यह अँगूठी मुझे मेरी स्त्री ने दी थी और जिस समय कि उसने इसे मेरी उँगली में पहनायी तो मुझ से इस बात की प्रतिज्ञा ले ली कि न तो मैं इसे कभी बेचूँ, न किसी को दूँ और न खोऊँ।

पुरश्री : इस भाँति के चुटकुले प्रायः बहाना करने वालों के पास गढ़े गढ़ाए रहते हैं। यदि आपकी स्त्री पागल न होगी तो वह इस बात के कह लेने पर कि मैंने आप के साथ इस अँगूठी की लागत से कितना बढ़ कर सुलूक किया, इसके दे डालने पर आप से सदा के लिये शत्रुता कदापि न ठान लेंगी। अच्छा मेरा प्रणाम लीजिए।

(पुरश्री और नरश्री जाती हैं)

अनन्त : मेरे सुहृद बसन्त अँगूठी उन्हें दे दो। इस समय उनकी उपकार और मेरी प्रीति को अपनी स्त्री की आज्ञा से बढ़ कर समझो।

बसन्त : जाओ गिरीश, दौड़ कर उन तक पहुँचो, यह अँगूठी उनको भेंट करो और यदि बन पड़े तो उन्हें किसी भाँति अनन्त के घर पर लाओ, बस अब चले ही जाओ देर न करो! (गिरीश जाता है) आओ हम तुम भी वहीं चलें, कल बड़े तड़के हम दोनों विल्वमठ की ओर चलेंगे, आओ अनन्त।

(दोनों जाते हैं)

दूसरा दृश्य

स्थान-वंशनगर की एक सड़क

(पुरश्री और नरश्री आती हैं)

पुरश्री : जैन के घर का पता लगा कर उससे झटपट इस पाण्डुलिपि पर हस्ताक्षर करा लो। हम लोग आज ही रात को चलते होंगे, जिसमें अपने पति से एक दिन पहले घर पहुँच रहें लवंग इस लिपि को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होगा।

(गिरीश आता है)

गिरीश : महाराज बड़ी बात हुई कि आप मिल गए। मेरे मालिक वसन्त ने अन्ततः सोच समझ कर वह अँगूठी आप की सेवा में भेजी है और प्रार्थना की है कि आज आप उन्हीं के साथ भोजन करें।

पुरश्री : मैं असमर्थ हूँ, हाँ उनकी अँगूठी मैंने सिर आँखों से स्वीकार की। तुम मेरी ओर से जाकर विनती कर देना। अब तुम इतनी कृपा और करो कि मेरे लेखक को शैलाक्ष का घर दिखला दो।

गिरीश : मैं प्रस्तुत हूँ।

नरश्री : (पुरश्री से) महाशय मैं आप से कुछ विनय किया चाहता हूँ। (अलग ले जाकर कहती है) देखिए मैं भी अपने पति की अँगूठी लेने का यत्न करती हूँ। मुझसे उन्होंने शपथ खाई थी कि में उसे जन्म भर अपने से पृथक् न करूँगा।

पुरश्री : अवश्य, चूकियो मत, हम लोगों को अच्छा अवसर हाथ आएगा। यह लोग शपथ खायँगे कि हमने अँगूठी पुरुषों को दी है परन्तु हम लोग उनकी एक न मानेंगी और आप सौगन्ध खाकर उन्हें झूठा बना लेंगी। बस अब चली ही जाव, तुम जानती हो जहाँ मैं ठहरी रहूँगी।

नरश्री : आइए महाशय, मुझे वह घर बतला दीजिए।

(दोनों जाते हैं)

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