लालच की सजा चौथा दृश्य...

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चौथा दृश्य


धनीराम , धनिया और मिसरी बैठे हैं।

धनीराम - भई, मैंने यह बताने के लिए तुम दोनों को बुलाया है कि तीन-चार दिनों से भैंसें दूध बहुत कम देने लगी हैं। मुझे सच-सच बताओ कि इसमें तुम लोगों की तो कोई चाल नहीं है?

धनिया - अगर हमारे हिस्से की भैंस का दूध कम होने में आपकी कोई चाल नहीं थी, तो आपके हिस्से की भैसों का दूध कम होने में हमारी चाल कैसे हो सकती है ठाकुर?

धनीराम - और अगर मैंने कोई चाल चली हो तो?

मिसरी - तो हमने भी चाल चली है।

धनीराम - कौन-सी चाल चली है?

धनिया - वही, जो तुमने चली है।

धनीराम - भैंस का पेट पानी से भर देने वाली? (यह कहते ही अपने मुँह को अपनी हथेली से बन्द करता है) अरे बाप रे, यह मेरे मुँह से क्या निकल गया?

धनिया - जो सही था, वही निकला है। तुमने शर्त तोड़ दी ठाकुर। आज से अपने हिस्से की भैंस को मैं अपने दरवाजे पर बाँधूँगी। नहीं मानोगे तो पंचायत में जाऊँगी।

धनीराम - ठीक है बाबा, अपने हिस्से की भैंस को तुम अपने साथ ले जाओ। हे भगवान, बैठे-बिठाए गाँव के एक परिवार का भरोसा खो दिया मैंने। ( यों कहकर धनिया के हिस्से की भैंस की रस्सी खोलकर उसके हाथ में थमा देने का अभिनय करता है) ये ले धनिया, यह भैंस आज से तेरे दरवाजे पर बँधेगी।

धनिया - नहीं ठाकुर। तुम्हें अपनी करनी पर पछतावा है तो इसे यहीं बँधी रहने दो। लेकिन तुमने अगर फिर से...

धनीराम - तौबा-तौबा।

धनिया - तब ठीक है।



धनिया की बात के साथ ही धीरे-धीरे मंच पर अँधेरा छाने लगता है और नेपथ्य से पुनः शुरुआत वाला गीत उभरने लगता है। मंच पर पूर्ण अंधकार के बाद पुनः प्रकाश होने लगता है। दर्शक देखते हैं कि गायक-मंडली पहले की तरह ही गीत गाती हुई मंच पर विचर रही है -

लालच खाए दीन-धरम को

लालच खाए किए करम को

लालच नाम डुबाय रे भैया जग में हँसी कराय।

दृश्य लोप

                                                                                                                                         बलराम अग्रवाल 

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