लालच की सजा तीसरा दृश्य...

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तीसरा दृश्य

धनिया - ठाकुर साहब, एक बात समझ में नहीं आ रही।

धनीराम - कौन-सी बात?

धनिया - मिसरी का बापू जब जिन्दा था तो बताता था कि ये पाँचों भैंसें सुबह-शाम दस-दस किलो दूध देवें थीं। जंगल में इन्हें चराकर लाने का जिम्मा मिसरी को मैंने इसी उम्मीद में दिलाया था कि खुली घास खाके इनके दूध में बढ़ोत्तरी होवेगी। कुछ दूध हम माँ-बेटे पी लेंगे, कुछ बाजार में बेचकर पैसे कमा लेंगे।

धनीराम - तो?

धनिया - तो यह कि दूध में बढ़ोत्तरी तो हुई लेकिन केवल आपके हिस्से की भैंसों के। मेरे हिस्से वाली भैंस शाम को तो ठीक-ठीक दूध देती है लेकिन सुबह का इसका दूध घट रहा है !!

धनीराम - भई, पाँचों भैंसों को एक ही जंगल में तेरा बेटा खुद ले जावे है। रात को चारा भी खुद डालकर जावे है। अब कौन-सी भैंस कितनी घास चर रही है और कौन-सी मटरगस्ती में और सोने टैम बिता रही है, मैं क्या जानूँ। मैं तो कभी उनके पीछे-पीछे जाता नहीं हूँ।

धनिया - कुछ न कुछ गड़बड़ तो है।

धनीराम - भई, जंगल में तो तेरा बेटा रहता ही है इनके साथ। रात में ये मेरे घर में रहती हैं। तुझे मेरी नीयत पर शक है तो किसी दिन खुद आकर देख ले मेरे घर में।

धनिया - वो तो मैं देखूँगी ही। और कान खोलकर सुन लो ठाकुर, अगर कोई गड़बड़ मैंने पकड़ ली तो तुम्हारे खिलाफ पंचायत बैठाकर अपने हिस्से की भैंस अपने घर में बाँध लेने की फरियाद करूँगी मैं।

मिसरी - वह भी हमेशा के लिए।

धनीराम - तो तुम दोनों को वाकई शक है मुझ पर?

धनिया - नहीं जी, आप तो अन्नदाता हैं हमारे। आप पर शक करूँगी मैं? मैं तो अपने मन की बात आपको बता रही थी। लगता है, मेरे भाग्य में ही कुछ खोट है जो इतनी अच्छी भैंस कम दूध दे रही है। मिसरी, बेटा ले जा इन भैंसों को जंगल में चराने।

मिसरी बिना कुछ कहे उठता है और भैसों को खूँटों से खोलकर जंगल के लिए हाँक ले जाने का अभिनय करता हुआ मंच के दाएँ भाग की ओर से चला जाता है। धनिया भी उठकर चली जाती है।

धनीराम (अपने आप से) - माँ-बेटा गरीब हैं लेकिन हैं तेज-तर्रार। मुझे लगता है कि आज से मेरी जासूसी जरूर करने लगेंगे ये लोग। ( यह बोलता हुआ वह अपनी जगह से उठता है और आगे बोलता है) लेकिन मेरी चालाकी को पकड़ना इनके वश की बात नहीं है। रात को उसके हिस्से की भैंस को इतना पानी पिला देता हूँ कि घास वह बेचारी खा ही नहीं पाती। इसीलिए तो सुबह को दूध कम देने लगी है। ही...ही...ही...।

यों बोलता हुआ अपनी चालाकी पर वह ही-ही करके हँसता है और जिस दिशा में मिसरी और उसकी माँ निकले थे उसी ओर निकल जाता है। मंच की दूसरी दिशा से भैंसों को हाँककर लाते हुए मिसरी प्रवेश करता है।

मिसरी (दर्शकों की ओर) - बड़ा चालू बनता है ठाकुर। हमारे घर की मदद करने के बहाने स्कूल जाना छुड़वा देना चाहता था मेरा। दूसरी चालाकी वह क्या कर रहा है, वह भी माँ ने मुझको समझा दिया है। आज से उसकी भैंसों का भी वही इलाज शुरू। इनको इस तालाब में छोड़ देता हूँ। शाम तक ये इसी में लेटेंगी, बैठेंगी और डटकर पानी पिएँगी। आज से दिन में मिलने वाली इनकी घास बन्द। केवल मेरे हिस्से वाली भैंस खाएगी घास। ( यों कहकर वह चार भैंसों को तालाब के पानी में उतार देता है) चलो-चलो, ठाकुर के हिस्से वाली तुम चारों भैंसें चलो पानी में। चलो-चलो।

उसी दौरान धनिया भी वहाँ पहुँच जाती है।

धनिया - बिल्कुल ठीक। दो-चार दिन में जब ये भैंसें भी कम दूध देना शुरू कर देंगी, तब आएगी उसे अकल। अब तू स्कूल जा बेटा। इनकी देखभाल मैं कर लूँगी।

मिसरी चला जाता है। धनिया भैंसों की देखभाल के लिए वहीं रुक जाती है और बीच-बीच में भैंसों को पानी से बाहर आने से रोकती भी जाती है।

धनिया - चलो-चलो...तालाब में ही रहो तुम चारों। चलो-चलो।



इस दृश्य को प्रकाश व्यवस्था के द्वारा तीन-चार बार दोहराकर यह दर्शाया जाता है कि ऐसा करते हुए तीन-चार दिन बीत गए हैं। अन्तत : प्रकाश धीमा होते-होते मंच पर अंधकार व पुन : प्रकाश के साथ ही दृश्य बदलता है।

बलराम अग्रवाल

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