दूसरा दृश्य
धनीराम - देख धनिया, गाँव का मुखिया हूँ तो गाँव वालों के सुख-दुरूख की जिम्मेदारी भी मेरी ही है। तेरा बेटा, ये मिसरी, माना कि अभी छोटा है लेकिन इतना छोटा भी नहीं है कि कुछ कर ही ना सके।धनिया - क्या काम करवाओगे इस भोले-भाले बालक से?
मिसरी (धीरे से) - अम्मा, असलियत में तो मुझे स्कूल जाने से रोकना चाहता है यह।
धनीराम - क्या कह रहा है बेटा?
धनिया - तुम्हारे बारे में नहीं बोल रहा। तुम काम क्या करवाओगे, यह बताओ।
धनीराम - भई, काम क्या पत्थर उठवाऐंगे इससे? हल्का-फुल्का ही बताएँगे कुछ।
धनिया - बताओ फिर।
धनीराम - भई, बात ये है कि बिना काम कराए तेरी कुछ मदद करूँगा तो ना तो तेरा मन उस मदद को मानेगा न मेरा। बिना मेहनत की कमाई का भोग लगाओ तो भगवान भी बुरा मानते हैं, है न।
धनिया - सो तो है।
धनीराम - वो सामने देख। मेरे घर में पाँच भैंसें हैं। मिसरी सुबह-सुबह इन्हें जंगल में चराने को ले जाए और शाम को वापस यहाँ लाकर बाँध दे। रात को इनके खाने के लिए चारा-पानी इनके सामने रख जाय, अपने घर जाकर सो जाय, बस।
धनिया - मजदूरी क्या दोगे?
धनीराम - मजदूरी? भई मजदूरी भी देंगे। मुफ्त में तो किसी से सड़क पर गिरा रुपया भी ना उठवाऊँ मैं।
मिसरी - रुपया क्या, तुम तो दस पैसे का एक सिक्का भी ना गिरने दो सड़क पर।
धनीराम (मिसरी की बात को अनसुना करते हुए) - हँ-हँ... कुछ कहा बेटे ने?
धनिया - कुछ नहीं। इसकी तो आदत है बैठे-बैठे कुछ बोलते रहने की।
धनीराम - तो बात पक्की?
धनिया - मजदूरी नहीं बताई आपने?
धनीराम - भई, ऐसा करते हैं कि पाँच में से उस बड़े कद वाली एक भैंस का दूध सुबह-सुबह तेरा। मंजूर है?
धनिया - नहीं।
धनीराम - तो?
धनिया - किसान की बेटी हूँ ठाकुर। इतना तो जानती ही हूँ कि ज्यादा उम्र की भैंस ज्यादा दूध नहीं देगी।
धनीराम - अरे भई, मैंने बड़े कद वाली भैंस कहा था, बड़ी उम्र वाली भैंस नहीं कहा।
धनिया - जो भी कहा हो। मुझे उस छोटे कद वाली भैंस का दूध चाहिए मजदूरी के बदले में।
धनीराम (हिचकते हुए) - उसका ले लेना।
धनिया - एक बात और।
धनीराम - क्या?
धनिया - सुबह-शाम दोनों वक्त का दूध चाहिए।
धनीराम - भई, ये तो उँगली पकड़ते-पकड़ते पौंहचा जकड़ने वाली बात हुई। काम कर या मत कर। दूध तो बस एक ही वक्त का मिलेगा, वो भी सुबह का।
धनिया - सोच लो।
धनीराम (दबे हुए स्वर में) - सोचना क्या? अब तू जिद ही पकड़ रही है तो भई, चाहे नुकसान हो जाए, लेकिन मदद तो तुझ गरीब की करनी ही है। लेकिन उस एक ही भैंस का दूध देना तय है, सोच ले। वह कम दे, ज्यादा दे, ना दे - सब तेरे भाग्य पर निर्भर है।
धनिया - ठीक है। कल सुबह से मिसरी अपना काम शुरू कर देगा।
मिसरी - अम्मा, सुबह से दोपहर तक तो मैं स्कूल में रहता हूँ।
धनिया - तू सुबह-सुबह इसकी भैंसों को जंगल में छोड़कर स्कूल चले जाया करना। दोपहर तक उनकी देखभाल मैं कर लिया करूँगी।
मिसरी - तब ठीक है।
धनीराम - तो कल सुबह से तय रहा। लेकिन दूध परसों सुबह से मिलना शुरू होगा। भई, इन भैंसों की चराई के बाद ही तो दूध पर तुम्हारा हक बनेगा?
धनीराम के इस संवाद के साथ ही प्रकाश के धीमा होते हुए दृश्य का लोप हो जाता है। बढ़ते प्रकाश के साथ ही मंच पर धनीराम , धनिया और मिसरी बैठे दिखाई देते हैं।
बलराम अग्रवाल
