लालच की सजा पहला दृश्य...

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पहला दृश्य

मंच पर अंधकार है। नेपथ्य से संगीत का स्वर उभरना शुरू होता है। उसके साथ धीरे-धीरे प्रकाश फैलना प्रारम्भ होता है और एक साधु महाराज के पीछे गाते-बजाते चलते एक स्त्री और एक युवक गायक का प्रवेश होता है। गीत गाते हुए वे तीनों मंच पर घूमने लगते हैं। इन तीन पात्रों से ही निर्देशक को धनीराम , मिसरी व उसकी माँ का अभिनय भी कराना है। वे डफली, मंजीरा आदि बजा-बजाकर गीत गा रहे हैं -

लालच बुरी बलाय रे भैया लालच बुरी बलाय।

लालच मन को खाय रे भैया लालच तन को खाय।।

लालच खाए दीन-धरम को

लालच खाए किए करम को

लालच नाम डुबाय रे भैया जग में हँसी कराय।

लालच बुरी बलाय रे भैया लालच बुरी बलाय।

लालच मन को खाय रे भैया लालच तन को खाय।।

एकांकी के किशोर 1, 2, 3 व 4 पात्र दर्शकों के बीच इधर-उधर अलग-अलग जगहों पर बैठाए जाएँगे। इस गीत के समाप्त होते-होते दर्शकों के बीच बैठे ये पात्र खड़े होकर बोलते हैं -

किशोर 1 - अजी गीत ही गाते रहोगे महाराज या नाटक को कुछ आगे भी बढ़ाओगे?

महाराज - यह गीत भी नाटक का ही हिस्सा है भाई। बीच में खड़े होकर टोका-टाकी मत करो। बैठकर चुपचाप देखते रहो।

किशोर 2 - लालच-वालच से हटकर कुछ बातें अकल की भी सुना दो महाराज।

किशोर 3 - दुनिया में सब के सब लालची नहीं हैं महाराज। बहुत-से लोग अक्लमंद भी हैं।

महाराज - ठीक है भाई। अक्ल से जुड़ी चीज भी आपको सुनाते हैं। (गायकों से) ...शुरू करो भाई।

महाराज के साथ वाले किशोर-किशोरी अपनी-अपनी डफली और मँजीरा बजाना शुरू करते हैं।

किशोर 4 - ये डफली मँजीरा छोड़ो पण्डित जी। हम लोग भजन-कीर्तन सुनने के लिए यहाँ नहीं आए। नाटक देखने आए हैं, नाटक दिखाओ।

महाराज - गीत-संगीत भी नाटक का जरूरी हिस्सा होते हैं भाई। इनसे इतना मुँह न मोड़ो।

किशोर 1 - निरे गीत-संगीत ने मंच को कितना छिछोरा बना डाला है, यह हम अपने घर के टी. वी. में रोजाना नहीं देखते हैं क्या?

महाराज - कहते तो ठीक हो। मैं तुम्हारी बात समझ गया। लेकिन मेरा यह गीत-संगीत तो एक भूमिका थी उस कथा की जिसे मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ। लेकिन आप सब कथा-कहानी सुनने तो आए नहीं हैं। आप तो नाटक देखने आए हैं। इसलिए सिर्फ सुनाऊँगा नहीं, घटित होता दिखाऊँगा। एक गाँव में मिसरी नाम का एक गरीब और भोला-भाला लड़का अपनी विधवा माँ के साथ रहता था। उसी गाँव में धनीराम नाम का एक लालची और बेईमान ठाकुर भी रहता था। हिन्दीलोक

यह संवाद बोलते-बोलते मंच पर प्रकाश धीमा होता जाता है और दृश्य परिवर्तन होता है। कथावाचक धनीराम का रूप धारण कर लेता है और उसके साथ वाले किशोर गायक व गायिका गरीब लड़के मिसरी और उसकी माँ धनिया की भूमिका में आ जाते हैं । धनीराम मिसरी की माँ से बातें कर रहा है।


बलराम अग्रवाल 

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